CBSE 3-Language Policy: CBSE की नई थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच मंगलवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया। शीर्ष अदालत ने फिलहाल इस नीति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन केंद्र सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब भी मांगे हैं। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि "कोई भी भाषा सीखना कभी बेकार नहीं जाता।" अगली सुनवाई 29 जुलाई को हालांकि, कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या अंग्रेजी को भारत की स्वदेशी भाषा माना जा सकता है और नई व्यवस्था को लागू करने में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर सरकार का पक्ष जानना जरूरी है। अदालत ने केंद्र, CBSE और संबंधित पक्षों को 10 दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी। क्या है नया नियम? CBSE ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए नई भाषा नीति लागू की है। इसके तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। विदेशी भाषा को केवल तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में चुना जा सकेगा। इस बदलाव के कारण कई विद्यार्थियों को वे विदेशी भाषाएं छोड़नी पड़ सकती हैं, जिन्हें वे प्राथमिक कक्षाओं से पढ़ते आ रहे हैं। हालांकि, CBSE ने पहले जारी दिशा-निर्देशों में कुछ राहत भी दी थी। जिन छात्रों ने पहले से दो विदेशी भाषाएं चुनी हैं, वे उन्हें जारी रख सकते हैं, लेकिन साथ में एक भारतीय भाषा पढ़ना अनिवार्य होगा। याचिकाकर्ताओं की क्या है आपत्ति? नई नीति को सुप्रीम कोर्ट में छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के एक समूह ने चुनौती दी है। उनका कहना है कि CBSE ने बिना पर्याप्त तैयारी के नई व्यवस्था लागू कर दी है। याचिका में दावा किया गया है कि अधिकांश स्कूलों में आवश्यक भाषा शिक्षकों की कमी है। कई भारतीय भाषाओं की पाठ्यपुस्तकें अभी उपलब्ध नहीं हैं और स्कूलों के पास इतना शैक्षणिक ढांचा भी नहीं है कि नई नीति को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। ऐसे में इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ेगा। कोर्ट में क्या हुई बहस? सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि 22 निर्धारित भारतीय भाषाओं में से अधिकांश की किताबें अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। उनका तर्क था कि जब न पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही अध्ययन सामग्री, तो छात्रों पर नई भाषा थोपना व्यावहारिक नहीं होगा। वकीलों ने यह भी कहा कि इतने कम समय में प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी ढांचे की व्यवस्था करना संभव नहीं है। इसलिए फिलहाल इस नीति के क्रियान्वयन पर रोक लगाई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का रुख सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि नई भाषा सीखना छात्रों के लिए नुकसानदायक नहीं हो सकता। अदालत का मानना है कि बहुभाषी शिक्षा विद्यार्थियों के विकास में मदद करती है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नीति के व्यावहारिक पक्षों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसी वजह से अदालत ने सरकार और CBSE से पूछा है कि स्कूलों में शिक्षकों, किताबों और अन्य संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए क्या तैयारी की गई है। क्या विदेशी भाषाएं पूरी तरह बंद होंगी? नई नीति के तहत फ्रेंच, जर्मन, जापानी जैसी विदेशी भाषाओं पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई गई है। छात्र इन्हें पढ़ सकेंगे, लेकिन पहले उन्हें दो भारतीय भाषाओं का चयन करना होगा। विदेशी भाषा तीसरे या अतिरिक्त विषय के रूप में ही पढ़ाई जाएगी। इसके अलावा CBSE ने यह भी स्पष्ट किया है कि कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में तीसरी भाषा का अलग बोर्ड एग्जाम नहीं होगा, ताकि विद्यार्थियों पर अतिरिक्त परीक्षा का दबाव न पड़े। नई शिक्षा नीति से जुड़ा है बदलाव थ्री लैंग्वेज पॉलिसी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का हिस्सा है। केंद्र सरकार ने 29 जुलाई 2020 को नई शिक्षा नीति को मंजूरी दी थी, जिसका उद्देश्य भारतीय शिक्षा प्रणाली को आधुनिक और बहुभाषी बनाना है। यह 34 वर्षों बाद शिक्षा नीति में सबसे बड़ा बदलाव माना गया। फिलहाल देशभर की नजर 29 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी है। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि CBSE की नई भाषा नीति को लेकर आगे क्या दिशा-निर्देश दिए जाएंगे और छात्रों की चिंताओं पर किस तरह का समाधान निकलेगा। ये भी पढ़ें: जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक की बिगड़ी तबीयत, ममता बनर्जी ने फोन पर की बात